वह दोपहर का सूर्यप्रकाश, पल-छिन में होगा सागर में विलीन।
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पल दो पल का अस्तित्व, बेहतर है करना सच का सामना।
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इंतज़ार ही नसीब में हो अगर, तो क्यों न ट्रेन और पटरी दोनों से दोस्ती बनाई जाए?
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अन्य तस्वीरें और छायाचित्रकार के मनोगत देखिए और पढ़िए, फोटो एसे की दूसरी कड़ी में अगले अंक में।
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